Thursday, May 27, 2010

एक संवाद माँ के साथ

माँ तुम मुझे याद आती हो
सच ! तुम याद आती हो
कभी आँखो मे आँसू बनकर
कभी दिल मे हौसला बनकर
कभी चेहरे पर मुस्कुराहट बनकर
सच तुम याद आती हो ॥

माँ मै तुम्हैँ देख सकता हूँ
छू नही सकता
मै तुमसे कह सकता हूँ
सुन नही सकता
मै तुम्हैँ महसूस कर सकता हूँ
लिपट नही सकता ॥

माँ मैँ आज भी गीला तौलिया बिस्तर पर भूल जाता हूँ
मैँ आज भी कोई चीज़ ढंग से नही रखता हूँ
मैँ आज भी कमरे मे जूते ले जाता हूँ !

डांटने के लिए ही सही
एक बार तो आओ
आना चाहोगी ?
आ पाओगी ?

अब बच्चा भी नही हूँ
कि समझ लूं तुम आ जाओगी
बड़े होने का दुख भी यही है
कि हम सच जानते हैँ
माँ तुम याद आती
सच ! तुम बहुत याद आती हो ॥ ॥
{समाप्त}

माँ आपका लाडला बेटा ज़ुबैर आलम उर्फ सोनू